बुधवार, 14 जुलाई 2010

नास्ति मातृसमा छाया, नास्ति मातृसमा गति:
नास्ति मातृसमा ऋणं, नास्ति मातृसमा प्रिय।

ऋग्वेद में नववधू को "साम्राज्ञी श्वसुरे भव" का आशीर्वाद मिलता है। तुम श्वसुर के घर की साम्राज्ञी होओ।

भार्या श्रेष्ठतम सखा। पत्नी को मोक्ष का हेतु माना गया। कोई भी धार्मिक कार्य पत्नी के बिना पूर्ण एवं सम्पन्न नहीं हो सकता था। श्रीराम ने भी सीताजी की स्वर्ण प्रतिमा बनवाकर यज्ञ पूरा करवाया था। शास्त्रों में ऐसे कई उदाहरण मिलते हैं जिनसे स्पष्ट होता है कि पत्नी का अपमान असहनीय था।

समाज में पुत्र का महत्व था पर कन्या की भी महत्ता खूब थी। स्वप्नवासवदत्तम् में राजा प्रणेत पुत्री के जन्म पर प्रसन्न होकर महारानी से मिलने जाते हैं और अपना आह्लाद यह कहकर प्रकट करते हैं कि कन्या पितृत्वं बहुवन्दनीयम्।

मनु ने भी भगिनी के लिए सम्पत्ति के चौथे भाग का विधान किया है। प्रक्षेपों या सामाजिक कुण्ठा के कारण मनु को लेकर कई विवाद खड़े किए गए, वरना यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता का उदात्त विश्व-आदर्श मनु की ही देन है। सर्वाधिक विवादास्पद समझी जाने वाली बात भी व्यर्थ ही मुद्दा बना दी गयी। पिता बचपन में कन्या का रक्षण करता है। भर्ता यौवन में..। यहाँ भी रक्ष धातु संरक्षण के अर्थ में है। ऐसे विधान किए जाने से ही समाज के प्रति अपनी कोई जिम्मेदारी निभाने की ओर पुरुषों का नियमन होता है, अन्यथा स्त्री काम, भोग-विलास से ज्यादा कुछ नहीं रहेगी।

वेदों की ऋचाएँ ब्राहृज्ञान के कारण ही संभव हैं। यह ज्ञान, ज्ञान का चरम स्वरूप है। अकेले ऋग्वेद में ही 27 ब्राहृवादिनियों का उल्लेख मिलता है। अदिति, जुहू, इन्द्राणी, सरमा, रात्रि, सूर्या, उर्वशी, अपाला, घोषा, गोधा, लोपामुद्रा, शाश्वती, रोमशा, सुलभा, विदुरा विश्ववारा आदि।

उपनिषद् काल में भी गार्गी, मैत्रेयी का उल्लेख मिलता है। यहाँ तक कि वाचक्नवी गार्गी शास्त्रार्थ में याज्ञवल्क्य तक को पीछे छोड़ देती है। उन्हें भी इस युक्ति का सहारा लेना पड़ता है कि तुम बहस मत करो वरना तुम्हारे सिर का पतन हो जायेगा।

पुराणों में मदालसा, देवाहुति, शैव्या, सुनीति, भामिनी आदि का उल्लेख मिलता है। रामायण में अनसुईया, शबरी, स्वयँप्रभा का उल्लेख मिलता है। सीता जी स्वयं अतीव विदुषी होने के साथ ही धुनष विद्या जैसी तकनीकी शिक्षा में भी दक्ष थीं। पुष्कर में शिलालेख में सीता जी को लव-कुश को धनुर्विद्या की शिक्षा देते हुए दिखाया गया है।

भवभूति ने उत्तररामचरितम् में सीता जी द्वारा मयूर नचाने का वर्णन किया है। ताली पर ताल देकर सीता जी मयूर नर्तन कराया करती थीं। अभिज्ञानशाकुन्तलम् में भी शकुन्तला आगे बढ़कर अपनी सखियों की मदद से राजा दुष्यन्त को प्रेमपत्र लिखती है और उसमें अपनी मन:स्थिति का बहुत गूढ़ निरूपण करती है। उससे स्पष्ट होता है कि उसे मनोविज्ञान का भली भांति ज्ञान था। महाकवि भास की नायिका वासवदत्ता कला के साथ-साथ राजनीति और कूटनीति में भी निष्णात थी। उसी के ज्ञान के आधार पर वह पति को पुन: राज्य प्राप्त करवाने के लिए सम्पन्न राज्य के राजा दर्शक की भगिनी पद्मावती के साथ अपने पति के विवाह के लिए तैयार हो जाती है।

प्राचीनकाल में सहशिक्षा भी व्यापक रूप से दृष्टिगोचर होती है। लव-कुश के साथ आत्रेयी पढ़ती थी। भवभूति ने भी मालती माधव में भूरिवसू तथा देवरात के साथ कामन्दकी का उल्लेख किया है, जो राजनीति और कूटनीति के ज्ञान में कहीं भी आर्य चाणक्य से कमतर नहीं दिखती। इन सब उदाहरणों से लगता है कि स्त्रियों को समानता तथा स्वतंत्रता का सुख उपलब्ध था।

बच्चों की शिक्षा औपचारिक रूप से ही नहीं, बल्कि अनौपचारिक रूप से अनवरत चलती रहती थी। वह शिक्षा संस्कारों की शिक्षा थी, जो जीवन भर काम आती है। कण्व ऋषि गृहस्थ नहीं हैं फिर भी बहुत मातृ ह्मदय से शकुन्तला का पालन-पोषण करते हैं। उसे पौधों और पक्षियों के पोषण का दायित्व देकर बचपन से ही जिम्मेदारी का पाठ पढ़ाते हैं। शकुन्तला प्रकृति के कण-कण में मानवीय चेतना के दर्शन करती है। शकुन्तला भी अपने पुत्र सर्वदमन को सिंह के दांत गिनना बचपन में ही सिखा देती है।

परित्याग किये जाने पर शकुन्तला राजा दुष्यन्त को भरे दरबार में फटकार लगाती हुई "अनार्य" तक कह देती है। इससे बड़ी गाली उस युग में और कुछ हो नहीं सकती।
साभार-पाञ्चजन्य से

1 टिप्पणी:

  1. यहाँ पॉजिटिव सोच पहली बार दिखी आप की पोस्टों में - इसे बनाए रखिए. बधाई हो हिंदी ब्लॉग लेखन हेतु.

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